21/07/14

बड़े अवसर के छोटे इशारे

लखनऊ में छोटी उम्र में ही माता-पिता को खोने वाली पंकज भदौरिया ने भविष्य संवारने के लिए स्नातक पूरा होते ही सीएमएस अलीगंज शाखा में अंग्रेजी शिक्षिका की नौकरी कर ली, उन्हें हमेशा से तरह-तरह के व्यंजन पकाने का शौक था पर एक टेलीविजन शो ने उनके जिंदगी को बदलने की राह दिखाई और एक इशारा दिया उस शौक को अपना कैरियर बनाने का जिसको वो हमेशा चाहती थी पर हो न सका .

उन्होंने इस शो के लिए अपने स्कुल से छुट्टी भी मांगी पर उन्हें छुटी नहीं दी गयी और अपने सपनो को पूरा करने के खातिर उन्होंने सोलह साल पुरानी नौकरी को छोड़ दिया .

ये कौन सोच सकता है की एक साधारण शिक्षिका उस रियलिटी शो में भाग लेने के लिए छुट्टी मांग रही थी जिस टेलीविजन शो का नाम “ मास्टरशेफ इंडिया” था और 25 दिसम्बर 2010 को इंडिया को पहला मास्टरशेफ मिला जिसका नाम “ पंकज भदौरिया “ था जो एक स्कुल टीचर थी .

जिन्दगी में बड़े अवसर तो अक्सर छोटे इशारो में ही छिप कर आते है. हिंदुस्तान की पहली मास्टर शेफ इंडिया का खिताब हासिल करने वाली लखनवी पंकज भदौरिया ने उस बात को साबित कर दिया कि अपने दिल की सुनो दिमाग की नहीं. पंकज के इस शौक और जूनून ने उनके काबिलियत को साबित करवाया और उनको देश ही नहीं विदेशो तक एक बहुचर्चित शेफ बना दिया .इस शो ने उन्हें एक करोड़ रूपये दिए साथ ही एक कुकरी शो के प्रसारण और बुक के कॉन्ट्रैक्ट के अधिकार भी .

एक मल्टीनेशनल कम्पनी एमवे इंडिया ने उन्हें अपने सबसे बढ़िया प्रोडक्ट ‘न्यूट्रीलाइट’ का ब्रांड अम्बेसडर बनाया है ,आज पंकज एक ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुकी है और यह सब घटित केवल इसलिए हो सका कि पंकज ने उस अवसर के छोटे से इशारे को पहचान लिया था.

गौरतलब:   जीवन में अक्सर ऐसे मौके आ ही जाते है जहाँ हमे कुछ दुविधाओ और आशंकाओ के बिच चुनाव करना पड़ता है ऐसे मौको पर केवल दिल की सुनिए और आगे बढिये

19/07/14

उम्मीद तो रखे पर दबाव ना डालें !

किसी शहर में एक शादी-शुदा महिला थी और उसकी 16 साल की एक बच्ची भी थी. उसके पति दूसरे शहर में नौकरी करते थे. उसने अपनी बेटी से बड़ी उम्मीदें लगा रखी थी और बेटी की छोटी सी गलती भी उससे बर्दाश्त नहीं होती थी.
जब बेटी की परीक्षाएं चल रही थी तब माँ ने उसे चेतावनी दी थी उसे मेरिट लिस्ट में आना ही हैं. मेरिट से कम कुछ भी स्वीकार नहीं होगा, यहाँ तक की प्रथम श्रेणी भी फेल होने की तरह मानी जाएगी. लड़की मेधावी थी लेकिन थी तो किशोरी ही. जब उम्मीदों का दबाव बढ़ा तो वह परेशान हो गयी. जैसे तैसे परीक्षाएं निबटी और अब रिजल्ट का इंतज़ार होने लगा. आखिर वह दिन आ ही गया.
माँ को सुबह सुबह काम पर जाना था सो बेटी रिजल्ट लेने गयी और माँ अपने ऑफिस. ऑफिस से उसने कई बार घर पर फोन लगाया लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया. हैरान परेशान माँ भोजन अवकाश में घर पहुंची. उसने देखा की दरवाजे की कुण्डी चढ़ी हुई थी.बहरहाल, वह अन्दर गयी. उसने देखा की बेटी के कमरे के टेबल पर कोई कागज़ रखा हुआ हैं. शायद कोई चिट्ठी थी. उसके मन में ढेरो शंकाएं उमड़ने घुमड़ने लगी उसने धडकते दिल से कागज़ उठाया. वह माँ के नाम बेटी का ही पत्र था. उसमे लिखा था:

प्रिय माँ ,
मुझे बताते हुए बड़ा संकोच हो रहा हैं की मैंने घर छोड़ दिया हैं और मैं अपने प्रेमी के साथ रहने चली गयी हूँ मुझे उसके साथ बड़ा अच्छा लगता हैं. उसके वो स्टाइलिश टैटू ,कलरफुल हेयर स्टाइल … मोटरसाइकिल की रफ़्तार, वे हैरतअंगेज करतब. वाह ! उस पर कुर्बान जाऊ. मेरे लिए ख़ुशी की एक और बात हैं. माँ , तुम नानी बनने वाली हो. मैं उसके घर चली गयी, वह एक झुग्गी बस्ती में रहता हैं. माँ उसके ढेर सारे दोस्त हैं. रोज शाम को वो सब इकठ्ठा होते हैं और फिर खूब मौज मस्ती होती हैं. माँ एक और अच्छी बात हैं अब मैं प्रार्थना भी करने लगी हूँ. मैं रोज प्रार्थना करती हूँ की AIDS का इलाज जल्दी से जल्दी हो सके ताकि मेरा प्रेमी लम्बी उम्र पाएं. माँ मेरी चिंता मत करना. अब मैं 16 साल की हो गयी हूँ और अपना ध्यान खुद रख सकती हूँ. माँ तुम अपने नाती -नातिन से मिलने आया करोगी ना ?
 -तुम्हारी बेटी

फिर कुछ नीचे लिखा था...

नोट : माँ ,परेशान होने की जरूरत नहीं हैं. यह सब झूठ हैं . मैं तो पडोसी के यहाँ बैठी हूँ. मैं सिर्फ यही दर्शाना चाहती थी की मेज़ की दराज में पड़ी मेरी मार्कशीट  ही सबसे बुरी नहीं हैं, इस दुनिया में और भी बुरी बातें हो सकती है।

बच्चों से उम्मीद तो रखे पर दबाव ना डालें.कही ऐसा ना हो की दबाव और डांट डपट के चलते वे कोई गलत कदम उठा ले और आपको भारी खामियाजा भुगतना पड़े .

12/07/14

जरा जोड़ना सीखिए !

एक दिन किसी कारण से स्कूल में छुट्टी की घोषणा होने के कारण, एक दर्जी का बेटा, अपने पापा की दुकान पर चला गया । वहाँ जाकर वह बड़े ध्यान से अपने पापा को काम करते हुए देखने लगा जो सिलाई में व्यस्त थे ।
उसने देखा कि उसके पापा कैंची से कपड़े को काटते हैं और कैंची को पैर के पास टांग से दबा कर रख देते हैं । फिर सुई से उसको सीते हैं और सीने के बाद सुई को अपनी टोपी पर लगा लेते हैं ।
जब उसने इसी क्रिया को चार-पाँच बार देखा तो उससे रहा नहीं गया, तो उसने अपने पापा से कहा कि वह एक बात उनसे पूछना चाहता है ? पापा ने कहा- बेटा बोलो क्या पूछना चाहते हो ? बेटा बोला- पापा मैं बड़ी देर से आपको देख रहा हूं , आप जब भी कपड़ा काटते हैं, उसके बाद कैंची को पैर के नीचे दबा देते हैं, और सुई से कपड़ा सीने के बाद, उसे टोपी पर लगा लेते हैं, ऐसा क्यों ?
पापा ने बहुत प्यार से उसे देखा और उसके सर पर हाथ फेरते हुए समझाया - ” बेटा, कैंची काटने का काम करती है, और सुई जोड़ने का काम करती है, और काटने वाले की जगह हमेशा नीची होती है परन्तु जोड़ने वाले की जगह हमेशा ऊपर होती है । यही कारण है कि मैं सुई को टोपी पर लगाता हूं और कैंची को पैर के नीचे रखता हूं........!!!
गौरतलब:   श्रेष्ठ वही है  जो जोड़ता  है , आप  कुछ ऐसा  काम करे जो  आपको लोगो से जोड़ती हो ,निश्चय ही  यह काम आपको श्रेष्ठ बना देगा   !